बाप के अंतिम संस्कार में बेटे नहीं आए…
यह केवल एक पिता की मृत्यु की कहानी नहीं, हमारे बदलते पारिवारिक संस्कारों के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है।

सुरेन्द्र मिश्रा संपादक, जनकल्याण मेल
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भोपाल के ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में 80 वर्षीय घनश्याम जी ने 4 अगस्त को अंतिम सांस ली। वे मूलतः इंदौर के रहने वाले थे। बताया गया कि करीब चार वर्ष पहले उनके दोनों बेटों ने उन्हें भोपाल के वृद्धाश्रम में छोड़ दिया था।
घनश्याम जी के निधन की सूचना उनके दोनों बेटों को दी गई। लेकिन वे पिता के अंतिम संस्कार में भी नहीं पहुंचे। उनके द्वारा कथित तौर पर यह कहकर आने से इनकार किया गया कि “इन्होंने हमारे लिए किया ही क्या है …?”
यह वाक्य पढ़कर या सुनकर मन विचलित होना स्वाभाविक है।
बताया जाता है कि घनश्याम जी कारोबारी थे और इंदौर में टायर-ट्यूब का बड़ा थोक व्यवसाय था, जिसे आज उनके दोनों बेटे संभाल रहे हैं। यदि यह तथ्य सही है, तो सवाल केवल इतना नहीं है कि बेटे अंतिम संस्कार में क्यों नहीं आए..? बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक परिवार इस स्थिति तक पहुंचा कैसे …?
यह घटना किसी एक परिवार पर टिप्पणी करने का अवसर नहीं, बल्कि पूरे समाज को आत्ममंथन करने का अवसर है।
केवल बच्चों को दोष देना भी उचित नहीं …
ऐसी घटना सामने आने के बाद सामान्यतः उंगली सीधे बेटे और बहू की ओर उठती है। निश्चित रूप से माता-पिता की उपेक्षा किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है। लेकिन हर मामले में केवल बच्चों को दोषी ठहरा देना भी उचित नहीं होगा।
परिवार दो पक्षों से बनता है – माता-पिता और बच्चे।
कई बार माता-पिता अपने बच्चों के पालन-पोषण में सारी आर्थिक जरूरतें तो पूरी करते हैं, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव पीछे छूट जाता है। बच्चों की हर इच्छा पूरी करना और उन्हें जीवन की हर सुविधा उपलब्ध करा देना, अपने आप में पारिवारिक संस्कार की गारंटी नहीं है।
बच्चे के साथ बैठना, उसकी बात सुनना, उसके मन को समझना, परिवार के बुजुर्गों के प्रति सम्मान का भाव पैदा करना और उसे रिश्तों का महत्व समझाना भी उतना ही जरूरी है।
क्या हमने बच्चों को सिर्फ सफलता सिखाई, रिश्ते नहीं …?
आज माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा और करियर को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग हैं।
बचपन से स्कूल, फिर कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाएं, अच्छे कॉलेज और उसके बाद बेहतर पैकेज की दौड़ शुरू हो जाती है। बच्चे उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं। फिर नौकरी के लिए महानगरों अथवा विदेशों में चले जाते हैं।
यह सब गलत नहीं है।
माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा सफल हो, आत्मनिर्भर बने और जीवन में आगे बढ़े। लेकिन इसी दौड़ में कहीं यह सवाल पीछे न छूट जाए कि हमने बच्चे को सफल तो बना दिया, लेकिन क्या उसे परिवार से जुड़े रहना भी सिखाया …?
जिस बच्चे के अच्छे पैकेज पर माता-पिता गर्व करते हैं, क्या उसे यह भी बताया गया कि माता-पिता का भावनात्मक सहारा भी जीवन की बड़ी जिम्मेदारी है …?
त्योहारों पर घर आना, कुछ समय माता-पिता के साथ बैठना, उनकी बातें सुनना और उनके अकेलेपन को समझना – इनका कोई आर्थिक मूल्य नहीं होता, लेकिन पारिवारिक जीवन में इनकी कीमत बहुत बड़ी होती है।
लेकिन माता-पिता की भी जिम्मेदारी है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम माता-पिता की भूमिका पर भी ईमानदारी से विचार करें।
बच्चे बड़े हो जाएं, अपना परिवार और व्यवसाय संभालने लगें तो माता-पिता को हर समय उनके जीवन में हस्तक्षेप करने के बजाय उन्हें स्वतंत्रता देनी चाहिए। बच्चों से प्रेम रहे, लेकिन हर निर्णय पर नियंत्रण की भावना न हो।
कई बार माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए समर्पित करने के बाद बुढ़ापे में उनसे हर निर्णय, हर खर्च और हर समय अपने अनुसार चलने की अपेक्षा करने लगते हैं। इससे भी पीढ़ियों के बीच दूरी पैदा हो सकती है।
यदि किसी परिवार में वर्षों से मनमुटाव, कटुता, संपत्ति या व्यवसाय को लेकर विवाद अथवा आपसी अविश्वास रहा हो, तो उसके परिणाम वृद्धावस्था में सामने आ सकते हैं।
इसलिए रिश्ते बुढ़ापे में नहीं, बचपन से बनाए जाते हैं।
माता-पिता को भी भविष्य के लिए तैयार रहना चाहिए …
जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, तब माता-पिता को भी अपने जीवन की दूसरी पारी की तैयारी करनी चाहिए।
अपनी जरूरत भर की आर्थिक व्यवस्था अपने नियंत्रण में रखें। अपनी बचत, पेंशन अथवा आय का कुछ हिस्सा सुरक्षित रखें। अपने स्वास्थ्य और रहने की व्यवस्था पर ध्यान दें। बच्चों पर प्रेम और भरोसा रखें, लेकिन अपनी पूरी आर्थिक निर्भरता केवल बच्चों पर न छोड़ें।
इसके बाद जीवन का समय केवल बच्चों के जीवन में हस्तक्षेप करने में नहीं, बल्कि धर्म, सेवा, आध्यात्मिकता, समाजसेवा, मित्रों और अपनी रुचियों में लगाना भी सुखद हो सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि माता-पिता बच्चों से अलग हो जाएं। इसका अर्थ केवल इतना है कि बुढ़ापे में आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान भी साथ रहना चाहिए।
वृद्धाश्रम बढ़ना समाज के लिए संकेत है।
आज देश के अनेक शहरों में वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है और उनमें रहने वाले बुजुर्गों की संख्या भी बढ़ती दिखाई देती है।
वृद्धाश्रम अपने आप में बुराई नहीं हैं। कई बुजुर्गों को वहां बेहतर देखभाल, साथ और सुरक्षा मिलती है। ‘अपना घर’ जैसे संस्थान कठिन परिस्थितियों में बुजुर्गों की सेवा कर रहे हैं, यह निश्चित रूप से मानवीय कार्य है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या वृद्धाश्रम हमारी मजबूरी बनते जा रहे हैं …?
यदि कोई बुजुर्ग अपनी इच्छा से वृद्धाश्रम में रहना चाहता है, तो बात अलग है। लेकिन यदि माता-पिता को परिवार में स्थान न मिलने के कारण वृद्धाश्रम पहुंचना पड़े और मृत्यु के बाद उनके अपने बच्चे अंतिम विदाई देने तक न आएं, तो यह समाज के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
बच्चों को संपत्ति से ज्यादा संस्कार दें …
आज माता-पिता बच्चों की पढ़ाई पर लाखों रुपये खर्च करते हैं। उनकी सफलता पर गर्व करते हैं। उनके लिए संपत्ति बनाते हैं। व्यवसाय खड़ा करते हैं। घर और भविष्य सुरक्षित करते हैं।
लेकिन बच्चों को यह भी सिखाना होगा कि माता-पिता कोई ‘दायित्व’ नहीं, हमारे जीवन की जड़ हैं।
और माता-पिता को भी बच्चों को यह नहीं सिखाना चाहिए कि उनका जीवन केवल माता-पिता की इच्छाओं के अनुसार चले। प्रेम में अधिकार हो सकता है, लेकिन अधिकार के साथ सम्मान और संवाद भी होना चाहिए।
अंतिम समय में सबसे ज्यादा जरूरत किसकी होती है …?
जीवन के अंतिम पड़ाव पर व्यक्ति को महंगे कपड़े, बड़ी गाड़ी या बैंक बैलेंस से ज्यादा जरूरत होती है – अपनेपन की।
किसी का हाथ पकड़ने वाले की।
दो शब्द प्यार से बोलने वाले की।
बीते जीवन की बातें सुनने वाले की।
और अंत में विदा करने वाले अपने किसी व्यक्ति की।
घनश्याम जी की कहानी हमें यही सोचने के लिए विवश करती है कि कहीं हम अपने बच्चों को जीवन की दौड़ में इतना आगे तो नहीं भेज रहे कि वे पीछे छूटते अपने माता-पिता को देख ही न पाएं …?
और कहीं हम माता-पिता भी बच्चों को बड़ा करने के बाद अपनी पूरी जिंदगी केवल उनकी मुट्ठी में तो नहीं सौंप देते …?
बच्चों को पढ़ाइए, आगे बढ़ाइए, सफल बनाइए लेकिन उन्हें परिवार से जोड़कर रखिए।
माता-पिता की सेवा का संस्कार दीजिए और स्वयं भी बच्चों के जीवन में प्रेम, संवाद और सम्मान बनाए रखिए।
क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना तब होगी, जब जिस बच्चे की सफलता पर माता-पिता ने पूरी जिंदगी गर्व किया हो, उसी सफलता के शोर में उनकी अंतिम पुकार कहीं दब जाए।
भगवान न करे, किसी माता-पिता का अंतिम प्रणाम ऐसी खामोशी में हो।





