भोपाल में सजी सुरों और शब्दों की अनुपम संध्या, झलका साहित्य का सौंदर्यबोध

‘अनुभूति’ के निवास पर काव्य गोष्ठी व दीपावली मिलन समारोह में —गजलकारा

भोपाल [जनकल्याण मेल] राजधानी की सुविख्यात गजलकारा अभिलाषा श्रीवास्तव ‘अनुभूति’ के निज निवास पर दीपों की उजास और भावों की महक से परिपूर्ण भव्य काव्य गोष्ठी एवं दीपावली मिलन समारोह का आयोजन हुआ। इस अवसर पर साहित्य, संगीत और संवेदना का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला जिसने श्रोताओं को आत्मीयता और रचनात्मकता के एक दुर्लभ लोक में पहुँचा दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत माँ सरस्वती के पूजन और दीप प्रज्ज्वलन से हुई, जिसके पश्चात् अभिलाषा ‘अनुभूति’ ने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा कि, साहित्य संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है, जो दीप की तरह अंधकार में भी उजाला फैलाता है।

इस सुमधुर शाम में साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे, वरिष्ठ गीतकार ऋषि शृंगारी, मध्यप्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष राजेंद्र गट्टानि, सचिव एवं प्रसिद्ध गजलकार मनीष बादल, सह सचिव डॉ. प्रार्थना पंडित, दुष्यंत संग्रहालय की अध्यक्ष श्रीमती करुणा राजुरकर, वरिष्ठ गजलकार दीपक पंडित तथा वरिष्ठ साहित्यकार अशोक निर्मल जैसे मनीषियों की उपस्थिति ने गोष्ठी को विशेष गरिमा प्रदान की।

डॉ. विकास दवे ने इस अवसर पर कहा कि “अभिव्यक्ति की असली ताकत वही है जो व्यक्ति को समाज से जोड़ दे और मनुष्य में संवेदना जगाए।

मनीष बादल और दीपक पंडित की गजलों ने श्रोताओं के हृदय में झंकार भर दी, वहीं डॉ. प्रार्थना पंडित की कविताओं में नारी संवेदना और आत्मबल का सशक्त स्वर सुनाई दिया।

युवा पीढ़ी की प्रतिनिधि कवयित्रियों स्वर्णिम नारंग, कविता श्रीवास्तव और सारिका चौकसे ने अपनी नवीन रचनाओं से मंच को ऊर्जा और कोमल भावनाओं से सराबोर कर दिया। उनकी कविताओं में आधुनिक समाज की नब्ज और स्त्री चेतना का सजीव प्रतिबिंब झलकता रहा।

संध्या के उत्तरार्द्ध में उपस्थित कवि-गजलकारों ने पारस्परिक संवाद और साहित्यिक विमर्श के माध्यम से रचना के सरोकारों पर भी गंभीर चर्चा की। दीपों की मृदु रोशनी और सुरों की गूंज के बीच शब्द जब गजल बनकर बहे, तो पूरा वातावरण एक मधुर आलोक से भर उठा।

कार्यक्रम का समापन अभिलाषा श्रीवास्तव‘अनुभूति’ की गजल “दीप जलते रहें, मन उजाले रहें…” के साथ हुआ, जिसने पूरे समारोह को आत्मीय भाव से बाँध दिया। अंत में सभी साहित्यप्रेमियों ने एक-दूसरे को दीपावली की शुभकामनाएँ दीं और यह संकल्प लिया कि शब्द, सृजन और संवेदना की यह लौ यूँ ही जलती रहे। यह साहित्यिक संध्या केवल एक काव्य गोष्ठी नहीं, बल्कि मनुष्यता, रचनात्मकता और संवाद के उजाले का एक जीवंत उत्सव बन गई।

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