*”उत्तम क्षमा – आत्मशुद्धि का पहला कदम”*
भगवान महावीर की दृष्टि से क्षमा धर्म का कालजयी संदेश …
जब समाज द्वेष, असहिष्णुता और प्रतिशोध की आग में झुलसता जा रहा हो, तब जैन धर्म से निकली यह पुकार — “मिच्छामि दुक्कडम्” — एक आत्मिक शांति की सौगंध की तरह सुनाई देती है।
वर्तमान युग की बेचैनी, तनाव और भटके हुए संवादों के बीच, “उत्तम क्षमा” केवल एक धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि आत्मा की स्वच्छता का वह विमल जल है, जो भीतर की कालिख को भी धो सकता है।
*क्षमा – धार्मिक नहीं, मानवीय कर्तव्य*
भगवान महावीर स्वामी, जिन्होंने केवल त्याग और तपस्या की नहीं, बल्कि आंतरिक जागृति की भी मिसाल दी — उन्होंने क्षमा को वीरता का गुण बताया। उनका स्पष्ट कथन था:
“क्षमा वीरस्य भूषणम्” “क्षमा वीरों का आभूषण है।”
यह कथन उस धैर्य और संयम की अपेक्षा करता है, जो परिस्थिति के विष में भी अपने भीतर करुणा का अमृत ढूंढ लेता है।
दशलक्षण धर्म की पहली शिला — उत्तम क्षमा
दिगंबर जैन धर्म का दशलक्षण पर्व, आत्मा की शुद्धि का पर्व है, और इसका पहला चरण है — उत्तम क्षमा। यह केवल “क्षमा मांगने” का दिवस नहीं, बल्कि क्रोध, मान, माया और लोभ से भीतर की मुक्ति का उत्सव है।
दशलक्षण धर्म के दस सोपान इस प्रकार हैं:
1. उत्तम क्षमा 2. उत्तम मार्दव 3. उत्तम आर्जव
4. उत्तम सत्य 5. उत्तम शौच 6. उत्तम संयम
7. उत्तम तप 8. उत्तम त्याग 9. उत्तम आकिंचन्य
10. उत्तम ब्रह्मचर्य
उत्तम क्षमा को सबसे पहले इसलिए रखा गया, क्योंकि बिना क्रोध के दमन के, आत्मा में कोई अन्य धर्म टिक ही नहीं सकता।
प्राकृत आगमों में क्षमा की व्याख्या
दिगंबर आगमों में क्षमा को केवल व्यवहारिक नहीं, बल्कि आत्मिक साधना कहा गया है। समयसार, नियमसार, कषायपाहुड़ जैसे शास्त्रों में इसकी गूढ़ विवेचना मिलती है।
उदाहरण गाथा (समयसार गाथा 136)
“कोहउप्पत्तिस्स पुयणं, बहिरंगं जदि हवदि सक्खादं।
ण कुंडदि किंचि वि कोहो, तस्स खमा होदि धम्मो त्ति॥”
भावार्थ:
यदि क्रोध के लिए कोई स्पष्ट कारण भी हो, फिर भी जो क्रोधित नहीं होता — वही सच्चा क्षमावान है। 👉 यह गाथा बताती है कि क्षमा तब असली होती है, जब उसे कठिन समय में भी निभाया जाए।
दूसरी गाथा (नियमसार)
*”खमेइ जो सो बिभमेइ ण किंचि…”*भावार्थ:
जो अपशब्द, आरोप, अपमान सब कुछ सह लेता है और फिर भी समता में स्थित रहता है, वही धर्म का धीर साधक है।
*यहाँ क्षमा को “धीरता” और “समत्व” का प्रतीक माना गया है।*
*वर्तमान संदर्भ में क्षमा की प्रासंगिकता*
आज जब संवाद की जगह टकराव, और क्षमा की जगह बदले की प्रवृत्ति घर कर गई है ऐसे में यह पर्व हमें आत्मनिरीक्षण का आईना दिखाता है।
मिच्छामि दुक्कडम्” कहना केवल दूसरों से नहीं, स्वयं से भी क्षमा माँगने का साहस है। हम कितनी बार अपने ही भीतर बैठे ‘क्रोध’ को क्षमा नहीं करते?
🙏 एक प्रार्थना, एक संकल्प
इस दशलक्षण पर्व पर, यह संकल्प केवल धार्मिक न बने। यह हमारे जीवन के व्यवहार का हिस्सा बने। राजनीति से लेकर पारिवारिक रिश्तों तक, जहाँ भी द्वेष है — वहाँ क्षमा का दीपक जलाना ही महावीर की सच्ची आराधना होगी।
“मैं किसी भी जीव को जान-बूझकर कष्ट न पहुँचाऊँ,
और जिसने मुझे कष्ट पहुँचाया, उसे हृदय से क्षमा करूँ।”
✍️ लेखिका की ओर से क्षमायाचना
यदि इस लेख के किसी शब्द, अभिव्यक्ति या अर्थ से किसी को दुःख पहुँचा हो — तो मैं सभी जीवों से हृदयपूर्वक क्षमा प्रार्थी हूं।
✍️ *जयेन्द्र जैन’निप्पूचन्देरी’* कवि,विचारक,समाजिक कार्यकर्ता भ्रमणभाष- 9407222244
🙏 “मिच्छामि दुक्कडम्”





