घरौंदा में कथा सुनने उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, बच्चों को सनातन संस्कृति और धार्मिक ग्रंथों से जोड़ने का किया आह्वान
श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन गूंजा श्रीकृष्ण भक्ति का संदेश, आचार्य मोहित भार्गव बोले ‘मानव जीवन का लक्ष्य भगवत प्राप्ति’

सुरेन्द्र मिश्रा
भोपाल [ जनकल्याण मेल] श्री प्यारे लाल खंडेलवाल आवासीय परिसर, बीडीए कॉलोनी, घरौंदा स्थित सिंहवाहिनी प्रांगण में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन भक्ति और आध्यात्मिकता का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। सैकड़ों महिलाएं रंग-बिरंगे परिधानों में अपने बच्चों के साथ कथा स्थल पर पहुंचीं और व्यासपीठ से प्रवाहित हो रही श्रीकृष्ण भक्ति की अमृतवाणी का श्रवण किया। कथा के दौरान श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में भाव-विभोर नजर आए।

भगवत प्राप्ति ही मानव जीवन का परम लक्ष्य …
व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए श्री आचार्य मोहित जी भार्गव महाराज ने कहा कि मानव जीवन केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं मिला है। मनुष्य जीवन का वास्तविक और अंतिम लक्ष्य भगवत प्राप्ति है। इसके लिए मनुष्य को अपने जीवन में भक्ति, सदाचार, सेवा, सत्संग और सद्कर्मों को स्थान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान को प्राप्त करने के लिए भक्त का भाव सबसे महत्वपूर्ण है। भगवान बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय में मौजूद श्रद्धा, प्रेम और समर्पण को देखते हैं। तुलसीदास जी, मीराबाई, संत रविदास और धन्ना भक्त जैसे अनेक महान भक्तों ने अपनी अटूट श्रद्धा के बल पर भगवान की अनुभूति प्राप्त की।
हर युग में होते रहे हैं निंदक, लेकिन भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए …
महाराज जी ने कहा कि महान संतों और भक्तों के जीवन में भी आलोचना और विरोध करने वाले लोग रहे हैं। तुलसीदास, मीराबाई और नामदेव जैसे भक्तों को भी समाज के एक वर्ग की आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भगवान और धर्म के प्रति सच्चा प्रेम रखता है, उसके लिए आलोचना उसकी साधना में बाधा नहीं बन सकती। मनुष्य को निंदा और आलोचना से विचलित होने के बजाय अपने कर्म और आचरण को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से दिया कर्म और धर्म का संदेश …
श्री आचार्य मोहित भार्गव ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन और श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश आज भी पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक है। श्रीकृष्ण ने संसार को कर्म, कर्तव्य, धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि मनुष्य का अधिकार कर्म करने पर है, परिणाम की चिंता करने के बजाय ईश्वर पर विश्वास रखते हुए अपने कर्तव्य का पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए। ईश्वर की इच्छा के बिना संसार में कोई कार्य पूर्ण नहीं होता।
बच्चों को सनातन संस्कृति और धार्मिक ग्रंथों से जोड़ें …
कथा व्यास ने अभिभावकों से विशेष रूप से कहा कि बच्चों को अपनी सनातन संस्कृति और धार्मिक परंपराओं की जानकारी देना आवश्यक है। उन्हें भगवान के विभिन्न अवतारों, श्रीराम, श्रीकृष्ण, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महान ग्रंथों से परिचित कराया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महान ग्रंथों का उद्देश्य केवल धार्मिक कथा सुनाना नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देना और लोककल्याण का मार्ग दिखाना है।
सुख में भी भगवान को न भूलें …

महाराज जी ने कहा कि जब मनुष्य के जीवन में दुख आता है तो वह भगवान की चौखट पर शीश नवाता है और उनसे सहायता की प्रार्थना करता है। लेकिन जब जीवन में सुख, संपन्नता और समृद्धि आती है तो कई लोग मंदिर, सत्संग और मानव सेवा से दूर होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा भक्त वही है जो दुख में ही नहीं, बल्कि सुख के समय भी भगवान को याद करता है। सुख और दुख दोनों को भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार करना चाहिए।
‘भगवान भक्तों के बस में हैं’…
श्रीकृष्ण और भक्त के प्रेम संबंध को समझाते हुए उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्त के प्रेम और समर्पण से बंध जाते हैं। भक्त की सच्ची भावना भगवान को आकर्षित करती है। भक्ति में वह शक्ति है जो मनुष्य के जीवन की दिशा बदल सकती है।
कथा के दौरान भक्ति भाव से श्रद्धालुओं ने इस भावपूर्ण पंक्ति को सुना –
हर सांस पर राम-कृष्ण के नाम का सुमिरन करें,
कहीं राम लिख दिया है, कहीं श्याम लिख दिया है,
सांसों के हर सिरे पर तेरा नाम लिख दिया है।”
इन पंक्तियों के साथ कथा स्थल भक्तिमय हो उठा और श्रद्धालु श्रीकृष्ण भक्ति में भाव-विभोर दिखाई दिए।
भक्ति, सेवा और सद्कर्म से सार्थक होगा जीवन ..
कथा व्यास ने धर्मप्रेमियों से आह्वान किया कि मनुष्य को अपने जीवन में भगवान का नाम, मानव सेवा, सदाचार और परोपकार को स्थान देना चाहिए। जीवन की व्यस्तताओं के बीच कुछ समय ईश्वर के स्मरण और सत्संग के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
उन्होंने कहा –
“सुख भी हमें प्यारे हैं, दुख भी हमें प्यारे हैं,
छोड़ूं मैं किसे भगवान, दोनों ही तुम्हारे हैं।”
श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण किया। कार्यक्रम के अंत में भगवान श्रीकृष्ण की आरती की गई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
धर्मप्रेमियों के लिए कथा का संदेश …
भगवान का नाम केवल मंदिर तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे व्यवहार, कर्म और विचारों में भी दिखाई दे। जिस जीवन में भक्ति, सेवा, सत्य और सदाचार आ जाए, वही मानव जीवन वास्तव में सार्थक है।





