250 साल में 120 किमी बदली कोसी की धारा, जानें क्यों कहलाती है बिहार का शोक

नई दिल्ली
भारत की प्रमुख नदियों में से एक है कोसी। यह चीन, नेपाल और भारत से होकर बहने वाली अंतरराष्ट्रीय नदी है। यह भारत में गंगा की प्रमुख सहायक नदी है। कोसी नदी तीन धाराओं सुन कोसी, अरुण कोसी और तमुर कोसी के मिलने से बनती है। ये तीनों धाराएं नेपाल और तिब्बत के हिमालयी इलाके से निकलती हैं। भारत-नेपाल सीमा से लगभग 48 किलोमीटर उत्तर में कोसी में कई बड़ी सहायक नदियां मिलती हैं और यह शिवालिक पहाड़ियों में संकरी 'छतरा गॉर्ज' (घाटी) से होते हुए दक्षिण की ओर बढ़ती है। इसके बाद यह नदी उत्तरी भारत के विशाल मैदान में बिहार में प्रवेश करती है और गंगा नदी की ओर बढ़ती है। लगभग 724 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यह पूर्णिया के दक्षिण में गंगा नदी में मिल जाती है।
कोसी: महाभारत काल में था 'कौशिकी' नाम
महाभारत और कई महाकाव्यों में कोसी का प्राचीन नाम 'कौशिकी' था। यह नदी मिथिला क्षेत्र की जीवनरेखा भी है। मिथिला क्षेत्र आज बिहार के आधे से अधिक हिस्से और उससे सटे नेपाल के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है और यह नदी इस क्षेत्र की लोक-कथाओं और किंवदंतियों का आधार भी है।
कोसी: इस नदी को कहा जाता है बिहार का शोक
कोसी को अक्सर 'बिहार का शोक' कहते हैं, क्योंकि इससे भीषण बाढ़ आती है। खासकर बिहार में। कोसी नदी 74,500 वर्ग किलोमीटर के इलाके से होकर बहती है, जिसमें से महज 11,070 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा भारत में आता है।
भारी मात्रा में मलबे के बहाव के कारण अपने अनियमित प्रवाह के लिए जानी जाने वाली कोसी नदी का उत्तरी भारत के विशाल मैदानों में कोई स्थायी मार्ग नहीं है।
कोसी नदी ने नेपाल से बिहार की ओर बहते हुए बाढ़ और बार-बार अपना रास्ता बदलने के कारण अतीत में भारी तबाही मचाई है।
250 साल में कोसी ने अपना रास्ता बदला
पिछले 250 सालों में कोसी ने अपना रास्ता पूरब से पश्चिम की ओर 100 किलोमीटर से ज्याद बदला है। नदी के इस अस्थिर स्वभाव की वजह मानसून के मौसम में इसके साथ बहकर आने वाली भारी गाद है।
कोसी बेसिन की रेतीली मिट्टी में बड़े पैमाने पर मक्का उगाया जाता है। इसकी सात मुख्य सहायक नदियां हैं-सुन कोसी, तामा कोसी या ताम्बा कोसी, दूध कोसी, इंद्रावती, लिखु, अरुण और तामोर या तामार।
कोसी ने ऐसे बदला अपना रास्ता
भारत के उत्तरी हिस्से (उत्तर-पूर्वी बिहार) में स्थित कोसी नदी का 'फैन' (जलोढ़ शंकु) दुनिया में किसी भी नदी द्वारा बनाए गए सबसे बड़े जलोढ़ शंकुओं में से एक है। यह 180 किलोमीटर लंबा और 150 किलोमीटर चौड़ा है।
इससे पता चलता है कि पिछले 250 वर्षों में 12 से अधिक अलग-अलग धाराओं के माध्यम से नदी का रास्ता 120 किलोमीटर से अधिक बदला है। कोसी नदी, जो 18वीं सदी में पूर्णिया के पास बहती थी, अब सहरसा के पश्चिम में यह बहती है।





