मतभेद से मनभेद तक और फिर आत्मबल की ओर बढ़ते कदम…
एक मंदिर, कुछ अनुभव और जीवन की बड़ी सीख

सुरेन्द्र मिश्रा …
जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो उस समय तो साधारण प्रतीत होती हैं, किंतु समय बीतने पर आत्मचिंतन का विषय बन जाती हैं। यह प्रसंग भी ऐसा ही है, जो केवल एक समिति, कुछ व्यक्तियों या एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, संगठन और आने वाली पीढ़ी के लिए एक गहरा संदेश समेटे हुए है।
धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं केवल भवनों से नहीं बनतीं। उनका वास्तविक आधार सेवा, समर्पण, विश्वास और पारस्परिक सम्मान होता है। जब तक ये तत्व जीवित रहते हैं, संस्था भी जीवंत रहती है। किंतु जब सत्य की आवाज़ उठाने पर संवाद कम होने लगे और अहंकार बढ़ने लगे, तब धीरे-धीरे दरारें दिखाई देने लगती हैं।
ऐसा ही एक समय आया जब कुछ सेवादारों के बीच वैचारिक मतभेद उत्पन्न हुए। विचारों का अलग होना स्वाभाविक है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव और समझ के आधार पर सोचता है। दुर्भाग्य तब हुआ जब विचारों का मतभेद धीरे-धीरे मन के मनभेद में परिवर्तित होने लगा।
जो लोग कभी साथ बैठकर मंदिर की योजनाएं बनाते थे, वे एक-दूसरे से दूरी बनाने लगे। संवाद समाप्त होने लगा। शुभ अवसरों पर भेजे गए संदेशों का उत्तर भी आना बंद हो गया। संबंधों की दरारें स्पष्ट दिखाई देने लगीं।
फिर भी मन में यह विश्वास बना रहा कि संबंधों को टूटने नहीं देना चाहिए। इसलिए विवाह वर्षगांठ, जन्मदिन और अन्य अवसरों पर शुभकामनाएँ भेजी जाती रहीं। यह अपेक्षा नहीं थी कि सामने वाला विशेष सम्मान देगा; केवल यह भावना थी कि संवाद का एक दीपक जलता रहे।
समय के साथ कुछ आर्थिक विषय भी सामने आए। मंदिर सेवा में किए गए योगदान और व्ययों को लेकर प्रश्न उठे। ऐसी परिस्थितियों में मन को पीड़ा होना स्वाभाविक है। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि जिन लोगों के साथ सेवा की, वही लोग मेरी सेवा की भावना को पूरी तरह समझ नहीं पाए।
यहीं से मंदिर की पारदर्शिता की दूसरी यात्रा आरंभ होती है, बाहरी संघर्ष के साथ भीतर की यात्रा …
निर्जला एकादशी का पावन अवसर था। मन में अनेक विचार थे। कुछ प्रश्न थे, कुछ शिकायतें थीं और कुछ अनुत्तरित भावनाएं भी थीं। ऐसे समय में सूक्ष्म रूप हनुमान जी के मंदिर पहुंचने का अवसर मिला।
मंदिर का वातावरण शांत था। वहां न कोई हलचल थी, न कोई पक्ष-विपक्ष, न कोई आरोप और न कोई प्रत्यारोप। हमने हनुमान जी को निहारा और उन्होंने हमको देखा और तभी भीतर से एक सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली संदेश सुनाई दिया –
“पहले की तरह मंदिर की साफ-सफाई करो। श्रीराम भक्त हनुमान जी को दण्डवत प्रणाम करते हुए सेवा करो वही हमें परम आनंद का अनुभव ।”
यह संदेश किसी व्यक्ति के बारे में नहीं था। इसमें किसी विवाद की चर्चा नहीं थी। इसमें केवल सेवा, समर्पण और भक्ति की झलक थी। हमने पूर्ववत मंदिर की साफ-सफाई की और श्रद्धापूर्वक दण्डवत प्रणाम किया। तभी एक गहरा सत्य समझ में आया यदि सेवा व्यक्तियों के लिए होगी तो अपेक्षाएं जन्म लेंगी। अपेक्षाएं टूटेंगी तो पीड़ा होगी। किंतु यदि सेवा प्रभु को समर्पित होगी, तो उसका आनंद स्वयं उसका पुरस्कार बन जाएगा।
यहीं पवनपुत्र हनुमान का जीवन हमें मार्ग दिखाता है। उन्होंने कभी सम्मान नहीं मांगा, कभी पद नहीं मांगा और कभी अपने कार्यों का प्रतिफल नहीं मांगा। उनका सर्वोच्च परिचय केवल एक था ,निस्वार्थ भाव से सेवा।
उन्होंने समुद्र लांघा, संजीवनी लाई, लंका में प्रवेश किया और असंभव कार्यों को संभव बनाया; किंतु हर उपलब्धि के बाद स्वयं को केवल “राम का सेवक” ही कहा।
आज समाज और धार्मिक संस्थाओं के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता धन या संसाधनों की नहीं, बल्कि संवाद, पारदर्शिता और सेवा-भाव की है। जब बड़े लोग मनभेद को बढ़ाते हैं, तब बच्चे और युवा भी वही सीखते हैं। और जब बड़े लोग धैर्य, संवाद और मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, तब वही संस्कार अगली पीढ़ी की पूंजी बनते हैं।
• विचारों में भिन्नता हो सकती है, संबंधों में कटुता नहीं।
• संवाद का बंद हो जाना किसी भी संगठन की सबसे बड़ी क्षति है।
• सेवा का उद्देश्य प्रभु की प्रसन्नता होना चाहिए, लोगों की प्रशंसा नहीं।
• आत्मबल बाहर से नहीं, भीतर की श्रद्धा से उत्पन्न होता है।
• मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का विद्यालय भी है।
• जो व्यक्ति परिस्थितियों से ऊपर उठकर सेवा करता है, वही वास्तविक साधक है।
• भगवान धन से नहीं, साधक के मन की निर्मल भावनाओं से प्रसन्न होते हैं।
आज हमें पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि यह केवल एक संगठनात्मक विवाद नहीं था। यह धैर्य, सेवा, क्षमा, श्रद्धा और आत्मबल की परीक्षा थी। और संभवतः प्रभु की यही इच्छा थी कि मनुष्य लोगों की ओर कम और अपने भीतर अधिक देखना सीखे।
जब मन चिंता से मुक्त होकर सेवा में लग जाता है, तब भीतर एक अद्भुत शांति जन्म लेती है। वही शांति आत्मबल बनती है, वही आत्मबल आनंद में परिवर्तित होता है और वही आनंद ईश्वर की कृपा का अनुभव कराता है।
“मतभेद जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन मनभेद सामने वाले की सोच है। सेवा हमारा धर्म है और आत्मबल ईश्वर का महा प्रसाद।”
यदि आने वाली पीढ़ी इस एक संदेश को समझ ले, तो समाज, संगठन और संस्कृति तीनों का भविष्य सुरक्षित रह सकता है।
हनुमान जी हम सभी को बल, बुद्धि, विवेक, विनम्रता और निस्वार्थ सेवा का मार्ग दिखाते हैं। आज के इस अनुभव का सार भी यही है कि जब मनुष्य सेवा को साधना बना लेता है, तब विवाद पीछे छूट जाते हैं और आत्मा को शांति मिलने लगती है।
जहां सेवा है, वहां हनुमान हैं।
जहां विनम्रता है, वहां श्रीराम हैं।
जहां श्रद्धा है, वहां कृपा का मार्ग स्वयं खुल जाता है।
निर्जला एकादशी के पुण्य अवसर पर प्रभु श्रीराम और पवनपुत्र हनुमान जी की कृपा हम सभी पर बनी रहे। हमारे मन में सदैव सेवा, सत्य और सद्भाव का प्रकाश प्रकाशित रहे।
बोलिए पवनसुत हनुमान की जय ! सिया वर रामचन्द्र की जय ! सनातन धर्म की जय ..!





