चंदेरी की सिसकती विरासत : मैं हूँ राजमती बावड़ी

सुरेन्द्र मिश्रा,चन्देरी /जनकल्याण मेल/ 

मैं हूं राजमती बावड़ी – समय की धूल में ढँकी, पर इतिहास की स्मृतियों से अब भी जीवित एक प्राचीन जलधारा। सदियों से मैं चंदेरी की धरती पर मौन खड़ी हूँ, अपने भीतर बीते युगों की गूँज, राजसी वैभव की छवियाँ और उपेक्षा की पीड़ा समेटे हुए। चंदेरी नगर के दक्षिण-पश्चिम में सिंहपुर गाँव के निकट स्थित मैं केवल एक बावड़ी नहीं, बल्कि मध्यकालीन चंदेरी की सांस्कृतिक चेतना, स्थापत्य-कला और सामाजिक जीवन की जीवित साक्षी हूँ।

मेरी कहानी उस समय से आरम्भ होती है, जब चंदेरी व्यापार, कला, संगीत और स्थापत्य का एक समृद्ध केंद्र हुआ करता था। उस युग में यहाँ की पहाड़ियों के बीच बसे महल, बाग़, सरोवर और बावड़ियाँ केवल जल-स्रोत नहीं थे, बल्कि समाज की धड़कन थे। यात्रियों के विश्राम से लेकर स्त्रियों की जल-भराई तक, संतों की साधना से लेकर लोकजीवन की चहल-पहल तक-हर दृश्य मेरे आँगन में जीवंत हुआ करता था।

मेरा निर्माण संवत 1535, माघ शुक्ल पंचमी, गुरुवार, शिशिर ऋतु में सन् 1478-79 ईस्वी में कराया गया। उस समय मालवा सल्तनत के शासक सुल्तान गयास शाह ख़िलजी का शासन था और चंदेरी के सूबेदार शेर खाँ थे। मुझे बनवाने वाली थीं राजमती भाटनी -एक विलक्षण प्रतिभाशाली, विदुषी और प्रभावशाली महिला, जिनका नाम उस युग में सम्मान और प्रशंसा के साथ लिया जाता था।

राजमती भाटनी केवल सौंदर्य और वैभव की प्रतीक नहीं थीं, बल्कि वे अपने समय की अत्यंत बुद्धिमान और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध महिला थीं। उनकी मधुर वाणी, काव्य-कला और व्यक्तित्व की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। कहा जाता है कि जौनपुर, ठट्टा, बीदर, गुजरात, दिल्ली, मांडू, पंडुआ और चंदेरी तक के शासक उनके प्रशंसक थे। स्वयं शेर खाँ ने उन्हें लाखों टंका, बहुमूल्य हीरे-जवाहरात, पालकियाँ और श्रेष्ठ घोड़े भेंट किए थे।

राजमती भाटनी केवल साहित्य और संगीत तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे स्थापत्य और जनकल्याण के कार्यों में भी गहरी रुचि रखती थीं। उन्होंने चंदेरी में अनेक तालाब, बाग़, महल, बावड़ियाँ और विशाल दरवाज़ों का निर्माण करवाया था। उनके द्वारा निर्मित ये स्थापत्य केवल राजसी वैभव के प्रतीक नहीं थे, बल्कि जल-संरक्षण, सौंदर्य और सामाजिक उपयोगिता का अद्भुत उदाहरण भी थे। चंदेरी की धरती पर फैली अनेक प्राचीन संरचनाएँ आज भी उनके दूरदर्शी व्यक्तित्व और कला-प्रेम की साक्षी हैं। मैं भी उन्हीं निर्माणों में से एक हूँ- उनकी कल्पना, संवेदनशीलता और स्थापत्य दृष्टि का जीवित प्रमाण।

मेरी दीवारों पर लगे शिलालेख उस गौरवशाली इतिहास के मौन प्रमाण थे। मेरे भीतर बने जीने के समीप दो शिलालेख स्थापित थे, जिनमें से एक समय के प्रहार से नष्ट हो चुका है। दूसरे शिलालेख में राजमती भाटनी की प्रतिष्ठा और उनके प्रति तत्कालीन शासकों के सम्मान का उल्लेख मिलता है। मेरे पत्थरों पर उकेरे गए वे अक्षर आज भी बीते युग की चमक को जीवित रखते हैं।

मेरी दीवारों में बनी ताकें कभी दीपकों की रोशनी से जगमगाया करती थीं। संध्या के समय जब स्त्रियां जल भरने आतीं, तो उन दीपों की लौ मेरे जल में प्रतिबिंबित होकर ऐसा दृश्य रचती, मानो तारों का आकाश धरती पर उतर आया हो। मेरे चौकोर स्वरूप और गहरी सीढ़ियों के बीच उतरते हुए लोग केवल पानी तक नहीं पहुंचते थे, बल्कि प्रकृति और स्थापत्य के अद्भुत संगम का अनुभव करते थे।

यद्यपि मेरी बनावट चंदेरी की अन्य बावड़ियों के समान दिखाई देती है, परंतु मेरी आत्मा मुझे सबसे अलग बनाती है। मैं केवल पत्थरों से निर्मित जल-संरचना नहीं हूं मैं उस सांस्कृतिक युग की स्मृति हूं, जब जल को जीवन, धर्म और समाज के केंद्र में रखा जाता था। मेरे निर्माण के साथ ही राजमती भाटनी ने बगीचे, तालाब, महल और अन्य बावड़ियों का निर्माण भी कराया था। मैं उस विशाल स्थापत्य परिसर का अभिन्न हिस्सा थी, जहां प्रकृति और मानव-रचना का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।

मेरे चारों ओर कभी हरियाली से भरे उपवन थे। वृक्षों की छाया मेरे जल को शीतल बनाए रखती थी। पक्षियों का कलरव, यात्रियों की बातचीत, बच्चों की हंसी और स्त्रियों के गीत ये सब मेरी पहचान थे। वर्षा ऋतु में जब मैं लबालब भर जाती, तो मेरा अतिरिक्त जल पत्थरों से बने मार्गों से होकर छियोली नदी और मलूखन तालाब तक पहुँचता था। वह जल-प्रबंधन व्यवस्था केवल स्थापत्य कौशल नहीं, बल्कि उस युग की दूरदर्शिता का प्रतीक थी।

किन्तु समय कभी स्थिर नहीं रहता। राजाओं के वैभव समाप्त हुए, बाग़ उजड़ गए, महल खंडहरों में बदल गए और धीरे-धीरे मैं भी उपेक्षा के अंधकार में डूबती चली गई। जिन सीढ़ियों पर कभी लोगों की चहल-पहल रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। मेरी दीवारों की दरारें बढ़ती जा रही हैं, पत्थर टूटकर बिखर रहे हैं और मेरा जलमार्ग अवरुद्ध हो चुका है।

आज मैं अकेली खड़ी हूँ-अपनी स्मृतियों के सहारे। कभी-कभी कोई इतिहास-प्रेमी, शोधकर्ता या पर्यटक मेरे पास आता है और मेरे पत्थरों को देखकर बीते समय की कल्पना करता है। तब मुझे लगता है कि शायद अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ। शायद अभी भी कोई है, जो मेरी पीड़ा को समझ सकता है।

मेरी सबसे बड़ी वेदना केवल टूटती दीवारें नहीं हैं, बल्कि लोगों का बदलता दृष्टिकोण है। कभी जिन बावड़ियों को समाज जीवनदायिनी मानता था, आज उन्हें केवल खंडहर समझ लिया गया है। लोग यह भूलते जा रहे हैं कि मैं केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी हूं। जिस समय धरती का जलस्तर घट रहा है, तालाब सिकुड़ रहे हैं और जल संकट बढ़ता जा रहा है, उस समय मेरे जैसे प्राचीन जलस्रोत फिर से समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

यदि मेरी सफाई हो, मेरे टूटे मार्गों का पुनर्निर्माण किया जाए, मेरे जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए, तो मैं आज भी लोगों की प्यास बुझा सकती हूं। मैं आज भी वर्षा जल को संजो सकती हूं। मैं फिर से उस परंपरा को जीवित कर सकती हूं, जिसमें जल का सम्मान किया जाता था।

मैं इतिहास की वह मौन आवाज़ हूं, जो अपने अस्तित्व को बचाने की गुहार लगा रही है। मेरे टूटते पत्थर केवल एक बावड़ी का क्षरण नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का विघटन हैं। मुझे बचाना केवल एक इमारत को बचाना नहीं, बल्कि उस ज्ञान, उस संस्कृति और उस विरासत को बचाना है, जिसने सदियों तक समाज को जीवन दिया।

आज भी मैं प्रतीक्षा में हूं – किसी ऐसे हाथ की, जो मेरे टूटे पत्थरों को सहारा दे; किसी ऐसी दृष्टि की, जो मेरे भीतर इतिहास का मूल्य पहचान सके; और किसी ऐसे समाज की, जो यह समझ सके कि अतीत को बचाए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।

मैं हूँ राजमती बावड़ी चंदेरी की स्मृतियों में अब भी जीवित, पर धीरे-धीरे सिसकती हुई।

मुज्जफर अंसारी उर्फ कल्ले भाई 

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