18 जनवरी : विश्व शांति दिवस ब्रह्मा बाबा की पुण्यतिथि पर आत्म-परिवर्तन और विश्व शांति का संदेश …

विश्व शांति बाहुबल से नहीं, आत्मबल से होगी संभव संपूर्ण विश्व में शांति की स्थापना केवल परमात्मा के मार्गदर्शन से ही संभव

सुरेन्द्र मिश्रा चन्देरी वाले MO. 9425381277

भोपाल [जनकल्याण मेल]।

18 जनवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मानव चेतना के जागरण और विश्व शांति के गूढ़ रहस्य से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय इस दिन को अपने साकार संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा की पुण्यतिथि के साथ-साथ वर्षों से विश्व शांति दिवस के रूप में मनाता आ रहा है।

यह दिवस मानवता को स्मरण कराता है कि जब संसार में अशांति, तनाव, हिंसा और नैतिक पतन चरम पर पहुँचता है, तब परमात्मा दिव्य ज्ञान, प्रकाश और चेतना के रूप में अवतरित होकर मानवता का मार्गदर्शन करते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से परमात्मा का अवतरण किसी शारीरिक जन्म के माध्यम से नहीं, बल्कि चेतना और ज्ञान के रूप में होता है। ब्रह्मा बाबा के जीवन में आया अलौकिक परिवर्तन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि परमात्मा साधारण मनुष्य को भी विश्व परिवर्तन का माध्यम बना सकते हैं।

इसी कारण 18 जनवरी केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि आत्मा–परमात्मा के मिलन, आत्म-परिवर्तन और विश्व शांति के संकल्प का दिवस माना जाता है।

इस अवसर पर सुख-शांति भवन की निदेशिका आदरणीय राजयोगिनी नीता दीदी ने कहा कि विश्व की प्रत्येक समस्या का समाधान बाहरी व्यवस्थाओं में नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन में निहित है। जब मनुष्य स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा से जोड़ता है, तब उसके विचार, शब्द और कर्म स्वतः ही शांति और कल्याण से भर जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आज का युग भौतिक प्रगति में भले ही आगे बढ़ गया हो, किंतु आध्यात्मिक शून्यता के कारण तनाव, अवसाद और अशांति बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में राजयोग ध्यान मानव को भीतर से सशक्त बनाकर जीवन में संतुलन, स्थिरता और सकारात्मकता प्रदान करता है। कार्यक्रम के दौरान सभी उपस्थितजनों ने विश्व शांति, सामाजिक सौहार्द, नारी सम्मान और सकारात्मक जीवन मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में ब्रह्मा बाबा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए वरिष्ठ राजयोगी भ्राता रामकुमार जी ने बताया कि ब्रह्मा बाबा का जन्म 15 दिसंबर 1876 को हुआ। वर्ष 1936 के बाद उनके जीवन में गहन आध्यात्मिक परिवर्तन आया और 1937 में ब्रह्माकुमारीज़ संस्था की स्थापना हुई। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन पवित्रता, त्याग और मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।

18 जनवरी 1969 को उन्होंने पार्थिव देह का त्याग किया, किंतु उनके विचार आज भी संपूर्ण विश्व में शांति, सद्भाव और आत्म-जागृति का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। वर्तमान में ब्रह्माकुमारीज़ संस्था 140 से अधिक देशों में राजयोग ध्यान, मूल्य-आधारित शिक्षा, नारी सशक्तिकरण और विश्व शांति के लिए कार्यरत है।

इसी आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भोपाल स्थित सुख-शांति भवन, नीलबड़ में भी विश्व शांति दिवस श्रद्धा, शांति और पवित्र वातावरण में मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत राजयोग ध्यान से हुई, जिसमें उपस्थितजनों ने आत्म-चेतना और परमात्म स्मृति का अनुभव किया।

कार्यक्रम में विशेष रूप से संघमित्रा जी, माहेश्वरी जी (उद्योगपति), इंस्पेक्टर संजीव जी, बच्चानी जी (व्यवसायी) सहित शहर के अनेक गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, महिलाएं एवं युवा उपस्थित रहे। सभी ने राजयोग ध्यान के माध्यम से शांति का अनुभव किया और सामाजिक सौहार्द एवं विश्व कल्याण हेतु अपने जीवन में सकारात्मक मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम का समापन शांतिमय वातावरण में ईश्वरीय प्रसाद वितरण के साथ हुआ। आयोजन का सार संदेश यही रहा कि विश्व शांति कोई दूर का स्वप्न नहीं, बल्कि आत्म-जागृति से संभव एक सजीव वास्तविकता है।

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