क्या संविधान (लोक तंत्र) खतरे में है …?

आलोक श्रीवास्तव बी कॉम एल एल बी जिला अभियोजन अधिकारी राजगढ़

भोपाल [जनकल्याण मेल] संविधान के अनुसार भारत में दो तरह से सरकार अर्थात् विधायिका की व्यवस्था की गयी है । एक संघीय सरकार और दूसरे राज्यों के विधान मण्डल अथवा विधानसभा । भारत के संविधान के अनुच्छेद 52 से 151 में संघ कार्यपालिका और अनुच्छेद 152 से 237 तक राज्य कार्यपालिका की व्यवस्था दी गयी है । संघ की और राज्यों की सरकार चुनने की एक लोकतांत्रिक व्यवस्था दी गयी है जिसके अनुसार एक मतांकन उपरांत चुनी गयी सरकार को पॉंच वर्ष तक कार्य करना होता है । पंचवर्षीय कार्यकाल पूर्ण होने के पूर्व चुनाव आयोग द्वारा आगामी पांच वर्ष तक संघ अथवा विधानमंडल/विधानसभा के चुनाव की तिथियॉं घोषित कर विधिवत चुनाव कराये जाने और फिर लोकतांत्रिक तरीके से सरकार चुनने हेतु विकल्प होते हैं ।

संविधान के निर्माण के समय संविधान निर्मात्री सभा के समक्ष 1952 में एक साथ चुनाव कराने का अवसर था जिसके फलस्वरूप संघ और विधानमंडल/विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाए गए संघ और राज्यों की पूर्ण लोक तांत्रिक सरकारों का गठन किया गया । चूंकि संविधान निर्माण के समय देश के पास संघ और राज्यों के एक साथ चुनाव कराने का अवसर था इस कारण संविधान निर्मा़त्री सभा के समक्ष *एक देश एक चुनाव* के विशेष प्रावधान संविधान में रखे जाने की आवश्यकता नहीं थी । यही कारण है तब एक देश एक चुनाव पर विचार नहीं किया गया।

तब संविधान लिखने वालों ने जहन में यह ख्याल बिल्कुल भी नहीं आया होगा कि देश में लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गयी सरकारों को किसी कारण से बर्खास्त कर दिया जायेगा और फिर संघ और राज्यों के चुनाव अलग अलग समय पर होने लगेगे।

संघ और राज्यों के एक साथ चुनाव कराने की यह व्यवस्था हमारे देश में चार बार 1952, 1957, 1962 और 1967 तक विधिवत रूप से चलती रही इसके उपरांत शनै:शनै: अलग अलग राज्यों के चुनाव संघ से अलग समय पर होने लगे और इसका कारण उनके पॉंच वर्ष के कार्यकाल पूर्ण होने का समय था । यहीं से भारत देश में *एक देश एक चुनाव* की परिपाटी समाप्त हो गयी और भारत की संघीय पार्टियों के छोटे छोटे दल में टूटना प्रारंभ होकर चुनाव लडने और फिर इन दलों के जीतकर आने के उपरांत गठबंधन सरकारों का उदय हुआ और तभी से *संविधान/लोकतांत्रिक व्यवस्था* के लिए खतरा उत्पन्न होना प्रारंभ हो गया ।

संविधान निर्मात्री सभा की संविधान की संरचना के समय यह भावना बिल्कुल भी नहीं थी कि देश में जब तब चुनाव होते रहें और पार्टियॉं अपने फायदे के लिए देश के नागरिकों को गुमराह करती रहे । संविधान निर्मात्री सभा की यह मंशा भी बिल्कुल नहीं थी कि देश में जब तब चुनाव होने से चुनाव में होने वाले बहुत बडे वित्तीय बोझ से देश कभी भी उबर न सके ।

संघ और राज्यों के संघीय ढांचे के अलग अलग समय पर पॉच वर्ष पूर्ण होने के समय में अंतर इस कारण भी आया, क्योंकि राज्य में कुछ घटनाओं से निर्मित कानून व्यवस्था की स्थिति पर राज्यों की सरकार द्वारा की गई वैधानिक कार्यवाहियां तत्समय की संघ की सरकारों को रास नहीं आईं…और इस स्थिति का हवाला देकर राज्यों की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को समय से पूर्व बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । चूंकि राष्ट्रपति शासन लागू करने के 6 माह के भीतर चुनाव कराने की संवैधानिक बाध्यता के कारण उक्त समय के भीतर ही चुनाव कराए गए जिससे संघ से पृथक समय पर चुनाव होने लगे।

राज्यों में मध्यावधि चुनाव की एक स्थिति इस कारण भी बनी कि 1967 के बाद बने छोटे छोटे दलों ने चुनाव लडना प्रारंभ किया और उनके द्वारा चुनाव में भाग लेकर चुनाव लडना भी आरंभ कर दिया गया । इसका परिणाम यह हुआ कि देश की राष्ट्रीय पार्टियों को राज्य में सरकार चलाने हेतु दो तिहाई बहुमत प्राप्त नहीं हुआ और कुछ राज्यों में क्षेत्रीय दल की ही सरकार बनी जिन्होंने राज्य को अपने निजी हितों के अधीन रखा….कई राज्यों और संघ में भी सरकार बनाने की भूमिका में छोटे छोटे दल किंग मेकर की भूमिका में आ गये । जिनकेे समर्थन से राष्ट्रीय पार्टियों ने दो तिहाई काल्पनिक बहुमत हासिल किया । इस प्रकार जो सरकारों का गठन हुआ वह सरकार बाहरी समर्थन से दो तिहाई बहुमत पूर्ण होने के आधार पर कार्य करने लगी । राज्यों में क्षेत्रीय दलों की अपनी छोटी छोटी जायज और नाजायज मांगें होती थी जो मांग पूरी न होने पर राज्य की सरकार चलाने के लिए दिए जा रहे बाहरी समर्थन वापस लिए जाने से सरकार गिर जाती । ऐसा अनेकों अवसर पर हुआ है।

किसी दूसरे दल के सहयोग से सरकार चलाने की स्थिति संघ की लोक तांत्रिक सरकार के सामने भी उपस्थित हुयी और संघीय सरकार से बाहरी समर्थन वापस लेने की यह स्थिति केन्द्र सरकार के समक्ष भी उपस्थित हुयी…. जब किसी एक दल को दूसरे दल अथवा क्षेत्रीय पार्टियों के द्वारा दिए जा रहे बाहरी समर्थन को वापस ले लिया गया फलतः सरकार गिर गयी और देश के सामने लोकतांत्रिक संकट उत्पन्न हो गया । दो बार केन्द्र की चुनी हुयी सरकार को अन्य पार्टी के समर्थन वापस लेने के कारण देश का मध्यावधि आम चुनाव से गुजरना पडा । पहली बार 1977-79 में राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस पार्टी सहित किसी भी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और जनता दल को कांग्रेस पार्टी के समर्थन देने से सरकार का गठन हुआ । 1979 में जनता दल की सरकार से कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार ढाई साल की अल्प समयावधि में सन् 1979 में गिर गयी । दूसरी बार में भी यही स्थिति निर्मित हुयी और किसी भी राष्ट्रीय पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और भारतीय जनता पार्टी सबसे बडें दल के रूप में उभरकर सामने आई । भारतीय जनता पार्टी की अटलबिहारी बाजपेयी की सरकार दिनांक 17 अप्रैल 1999 को संघ में दो तिहाई बहुमत के लिए अपेक्षित 270 में से मात्र एक वोट कांग्रेस पार्टी के सांसद गिरधर गमांग जो उड़ीसा के मुख्यमंत्री तो बन गए थे पर उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया था उन्होंने सरकार के विपक्ष में वोट दिया और इंद्र कुमार गुजराल की नेशनल पार्टी के अटल बिहारी जी की सरकार में केंद्रीय मंत्री सैफुद्दीन सोज ने सरकार के विरुद्ध वोट किया जिसके कारण सरकार गिर गयी और देश को दूसरी बार अल्पावधि मध्यावधि चुनाव का सामना करना पडा और जनता के करोडो रूपयों की आहुति होकर देश में फिर चुनाव हुए ।

अधिक वोट लेने की होड* देश में गठबंधन की सरकारों के उदय होने से नेशनल पार्टी के अलावा अनेकों छोटे छोटे दल होने से सभी में अधिक से अधिक वोट लेने की प्रतियोगिता शुरू हुयी और अधिक संख्या में वोट प्राप्त करने के उद्देश्य से वोटों का धुव्रीकरण और तुष्टिकरण की राजनीति की शुरूआत हुई । ऐसे जाति और समुदाय जो समूह से चलते हैं उनके फायदे के बारे में ही सोचा जाने लगा । जिससे *लोक तांत्रिक तरीके से चुने जाने वाली सरकारें अप्रत्यक्ष रूप से जाति और धर्म से चुने जाने वाली सरकारें* होने लगी ।

संविधान निर्मात्री सभा की संविधान की संरचना के समय रही मूल भावना की देश को बार बार चुनावों का सामना न करना पड़े को सभी नेता चाहे वह किसी भी पार्टी का हो जरूर समझता है पर यह समझ देश के 90 प्रतिशत आम नागरिकों को नहीं होती है क्योंकि उनका इससे कोई सरोकार नहीं होता इसीलिए देश के आम नागरिक संविधान बनाने वालों की मूल भावना को नहीं समझ पाते हैं । यही कारण है कि वह विभिन्न नेताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से अपने फायदे के लिए दिए गये वक्तव्य और भाषण से गुमराह हो जाते हैं ।

हमारे इस लेख के माध्यम से आज इस बिन्दु पर विचार कर मनन करना आवश्यक हो गया है कि संविधान निर्माण के समय संविधान निर्मात्री सभा की देश हित की मूल भावना क्या रही है । हमारे देश में ऐसी स्थितियॉं भी उत्पन्न हुयी हैं जब देश में संविधान के आर्टिकल 368 संविधान में संशोधन की शक्ति और प्रक्रिया का दुरूपयोग हुआ है और संविधान निर्मात्री सभा और संविधान की मूल भावना के विपरीत जाकर संविधान में संशोधन किए गये हैं । वर्तमान परिपेच्छ में संविधान निर्मात्री सभा की मूल भावना को समझने हेतु संविधान निर्माण हेतु तैयार की गयी कार्यकारिणी और संविधान प्रारूप का समझना आवश्यक है:-

संविधान निर्मात्री सभा और संविधान का प्रारूप*:= संविधान की प्रारूप समिति के 7 सदस्य थे डॉ0 बी आर अम्बेडकर अध्यक्ष, एन गोपालस्वामी अयंगर, अल्लादि कृष्णस्वामी अययर, कन्हैयालाल मुंशी, मोहम्मद सादुल्ला, एन माधव राव टी टी कृष्णामचारी ।

संविधान निर्मात्री सभा में 389 सदस्य थे जो बाद में मुस्लिम लीग के सदस्यों के अलग होने के कारण 299 सदस्य रह गए थे इन सभी ने अपने परिचय पत्र जमा करके संविधान पर हस्ताक्षर किए थे । दिसंबर 1947 तक 299 सदस्य जिनमें 12 भारतीय प्रांतों से चुने गये 229 सदस्य और 29 रिसासतों से मनोनीत 70 सदस्य थे । संविधान की मूल प्रति को अंग्रेजी भाषा में अपनी हस्तलिपि में प्रेमबिहारी नारायण रायजादा ने लिखा था । संविधान की मूल प्रति के हर पृष्ठ पर उनका नाम लिखा हुआ है ।

भारतीय संविधान में पहले पन्ने पर भगवान राम सीता, लक्ष्मण हनुमान, के चित्र है 13 वें भाग में महाबलीपुरम मंदिर की कलाकृतियॉं है 14 वें भाग में अकबर के दरबार का चित्र है संविधान के भाग छः में महावीर का ध्यान मुद्रा का चित्र है, भाग नौ के पहले पन्ने पर राजा विक्रमादित्य के जीवंत राज दरबार का चित्र, भाग 16, रानी लक्ष्मीबाई को मैसूर के राजा टीपू सुल्तान के साथ कवच में चित्रित किया गया है । 19 वें भाग में सुभाषचन्द्र बोस का चित्र है । संविधान में भगवान बुद्ध का भी चित्र है।

विचार करें कि जब धर्म से संबंधित उक्त चित्र संविधान में रखे गए तो बाबा साहब ने अपने द्वारा तैयार किए गए संविधान में इन्हें शामिल क्यों किया …. इसके पीछे यही कारण हैं कि बाबा साहब भले ही भगवान बुद्ध के अनुयाई थे, पर सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रति उनका एक आदर था जो संविधान में स्पष्ट नजर आता है

किंतु आज बाबा साहब को मानने वाले सनातन धर्म को भीम राव आंबेडकर से अलग मानने लगे हैं ।

मूल संविधान आज भी सुरक्षित:=* मूल संविधान को संसद भवन के पुस्तकालय में हीलियम गैस से भरे हुए एक विशेष चैंम्बर में रखा गया है । मूल संविधान से पहली कॉपी देहरादून में सर्वे ऑफ इंडिया के प्रेस से छपी थी ।

वर्तमान आवश्यकता> आज देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह आवश्यक होगा कि संविधान निर्मात्री सभा की संविधान की संरचना के समय रही मूल भावना के परिप्रेच्छ में चुनाव की वर्तमान प्रचलित व्यवस्था में *

एक देश एक चुनाव* की व्यवस्था करने हेतु संविधान में आवश्यकता अनुसार संशोधन किए जाकर यह व्यवस्था लागू की जाये ताकि बार बार होने वाले चुनाव से देश के करोड़ों रूपये बचे और दूसरा देश की जनता को बार बार गुमराह न किया जा सके

हमारे देश में वर्तमान में राजनैतिक विचारधारा इतनी प्रबल हो चुकी है कि देश के कल्याण हेतु किए जा रहे प्रयासों को लोकतंत्र के लिए खतरा बतलाकर आम नागरिकों को गुमराह कर दिया जाता है । हास्यास्पद बात यह है कि जिन तथ्यों के संबंध में लोक तंत्र को खतरा और संविधान विरोधी बतला दिया जाता है वे तथ्य मूल संविधान के भाग है नहीं बल्कि उन्हें संघ की प्रचलित सरकारों ने वोटों के तुष्टिकरण की राजनीति के फलस्वरूप संविधान में संशोधन कर बाद में प्रतिस्थापित कर दिए है ।

जैसे-1 प्रस्तावना में संशोधन कर जोडा गया शब्द पंथ निरपेक्ष

2 जम्मू काश्मीर के धारा 370 और 35-ए के विशेष प्रावधान,

3 धर्म आधारित आरक्षण आदि ।

4 संविधान की मूल भावना एक देश एक चुनाव की जागरूकता

पंथ निरपेक्ष:- वर्ष 1976 में किए गये 42 वें संविधान संशोधन से भारत के संविधान की प्रस्तावना में पंथ निरपेक्ष शब्द जोडा गया है जबकि संविधान के अनुच्छेद 368 में स्पष्ट रूप से लेख है कि संविधान के संशोधन से मूल ढांचे को नहीं बदला जायेगा । माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा केशवानंद भारती के मामले में दिए गये अपने ऐतिहासिक फैसले में भी यही तथ्य अवधारित किए है, किन्तु 1976 में संविधान के मूल ढांचे अर्थात् प्रस्तावना में किए गये उक्त संशोधन पर किसी भी राजनैतिक दल अथवा किसी संघीय या राज्य सरकार ने कोई आपत्ति नहीं की यहां तक की हमारे देश की सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वतः संज्ञान लेकर इस संशोधन को हटाये जाने संबंधी कोई कार्यवाही नहीं की है । जबकि यह संशोधन प्रस्तावना में किया गया और प्रस्तावना का वही स्थान है जो किसी भवन में उसकी नींव का होता है इसी प्रस्तावना पर संविधान रूपी भवन निर्मित है….

जम्मू काश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35-ए के विशेष प्रावधान*

संविधान के अनुच्छेद 370 में जम्मू काश्मीर राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने के प्रावधान 17 अक्टूबर 1949 को भारतीय संविधान में शामिल किए गये । इन प्रावधानों को संविधान सभा के मूल प्रारूपकार भीमराव बाबा साहब अम्बेडकर ने संविधान में सम्मिलित नहीं किया बल्कि अनुच्छेद 370 के मुख्य प्रारूपकार गोपालस्वामी अययंगार थे जिनके द्वारा जम्मू काश्मीर के तत्कालीन शासक श्री हरिसिंग को संतुष्ट करने हेतु इन प्रावधानों को भारतीय संविधान का भाग बनाया गया जबकि यह प्रावधान संविधान की मूल भावना समानता के मूल अधिकार के विपरीत भी है । यह कहां तक उचित है कि एक देश के एक राज्य के नागरिकों को विशेष राज्य के नागरिक होने का अधिकार प्राप्त हो और दूसरे राज्यों के नागरिकों के पास वह विशेषाधिकार न हो ।

धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार संसद को जम्मू काश्मीर के बारें में रक्षा, विदेश एवं संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है किन्तु इन तीन विषयों के अतिरिक्त किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को बनाने और उसे राज्य में लागू करवाने के लिए केन्द्र की सरकार को राज्य सरकार को अनुमोदन आवश्यक होता है । इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू काश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती । इस धारा के तहत राज्य को अपना संविधान, झंडा और अलग कानून बनाने का अधिकार था ।

एक देश एक चुनाव की अवधारणा और लोक तंत्र समाप्त करने की शुरूआत-

संविधान के निर्माण के समय संविधान निर्मात्री सभा के द्वारा लिए गए निर्णय एक साथ चुनाव कराए जाए को आज लोगों को समझ आ गया है वर्तमान सरकार इसी समझ के कारण एक देश एक चुनाव का बिल लेकर आई है जो देश हित में अति आवश्यक भी है

सरकारों का अल्पकाल में पतन- संघ और राज्यों के संघीय ढांचे के अलग अलग समय पर पॉच वर्ष पूर्ण होने के समय में अंतर इस कारण आया, कि किसी भी कारण से राज्यों की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार या तो समय से पूर्व बर्खास्त कर दी गयी या फिर सरकार बाहरी समर्थन से दो तिहाई बहुमत पूर्ण होने के आधार पर कार्य कर रही थी और बाहरी समर्थन वापस लिए जाने से सरकार गिर गयी । बाहरी समर्थन वापस लेने की यह स्थिति दो बार संघीय सरकार में भी निर्मित हुई है। यह स्थिति भी संविधान की मूल भावना के विपरीत है क्योंकि छोटे छोटे कारणों से सरकार की बर्खास्तगी उचित नहीं है

यह एक कडवा सच है कि वर्तमान परिपेच्छ में देश की लोक तांत्रिक सरकारें अब लोकतांत्रिक रूप से चुनी गयी सरकारें नहीं रह गयी है बल्कि धर्म और जाति के द्वारा चुनी गयी पार्टी और उनकी सरकारें हो गयी हैं । राजनैतिक दलों के इस प्रकार के आचरण और व्यवहार से लोक तंत्र शनै शनै समाप्त हो रहा है

राजनैतिक दलों के आचरण और व्यवहार में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं होने से जहन में आज यह विचार जरूर आता है कि क्या देश के लिए लोक तंत्र अब भी जरूरी है या इसे एक बार में ही समाप्त किए जाने की आवश्यकता है ।

हमारे देश में लोक तंत्र के कारण सरकार खुल कर देश हित में काम नहीं कर पाती है क्योंकि उन्हें 5 साल बाद पुनः सत्ता प्राप्त करने की लालसा होती है और इस दिशा मे वे लोगों को प्रभावित करने में लगी रहती है…. हमारे देश के लगभग साथ साथ आजाद हुए देश आज बहुत ही ज्यादा विकसित और आत्मनिर्भर हो चुके हैं उन देशों में सरकारों ने खुलकर काम किया है जो उपद्रवी और देश हित के विपरीत सोच के लोगों का बल पूर्वक दमन किया गया है जबकि हमारे देश में देश हित के विपरीत सोच रखने वाले लोग और उनकी तथाकथित गैंग फल फूल रहे हैं।

यह भी एक कडवा सच है कि आज पार्टियॉं अपने फायदे के लिए संविधान की मूल भावना को नहीं समझती है ।

आज कल चुनावों के वक्त संविधान हाथ में लेकर प्रचार करने की परम्परा भी पनप गयी है । लोकतंत्र की पुस्तक बतलाकर लोगों को भय दिखाया जाता है कि संविधान खतरे में हैं ।

इस आचरण से महाभारत काल की एक घटना सहसा याद आ जाती है. :-

महाभारत काल की घटना आज भी प्रासंगिक :-

कौरव और पांडव गुरू द्रोणाचार्य के पास अपनी शिक्षा ग्रहण कर चूके थे । गुरू द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को विदाई देने के पूर्व दुर्योधन को बुलाकर आदेश दिया कि तुम जाकर देखकर आओ कि हस्तिनापुर में कितने नागरिक ऐसे है जो पुण्य कार्यो में संलग्न एवं देव आचरण करते हैं । शाम को दुर्योधन ने आकर बताया कि हस्तिनापुर में कोई भी नागरिक ऐसा नहीं है जो पुण्य कार्यो में संलग्न रहकर देव आचरण करते हों तब द्रोणाचार्य ने पूछा कि कैसे लोग हैं तो दुर्योधन ने कहा कि सभी क्रूर और दुराचरण करने वाले है । फिर द्रोणाचार्य ने युद्धिष्ठिर को कहा कि दुर्योधन ने कहा है कि सभी क्रूर और दुराचरण करने वाले है तो तुम देखकर आओ कि सर्वाधिक कूर और दुराचरण करने वाले कितने लोग है ताकि उन्हें राजसभा से दंडित कराया जा सके । दूसरे दिन युद्धिष्ठिर ने आकर बताया कि गुरू देव हस्तिनापुर में तो सभी लोग पुण्य कार्याे में संलग्न है और कोई भी क्रूर या दुराचरण प्रदर्शित नहीं करता है । तब द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों से पूछा कि इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो जैसा होता है उसे सामने वाले व्यक्ति में अपनी ही छबि दिखाई देती है । दुर्योधन का आचरण क्रूूर और दुराचरण वाला है इसलिए उसे सभी व्यक्तियों में अपनी ही छबि दिखाई दी जबकि युद्धिष्ठिर का आचरण सदाचारी है इस लिए उसे कोई भी क्रूर या दुराचरण करने वाला नहीं मिला । गुरू द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों को आश्रम से विदा देने के पूर्व हमेशा सदाचारी और पुण्य कार्यो को संपादित करने की सलाह दी ।

तो आइये अब बात करते हैं कि संविधान कैसे और कब कब खतरे में आया है:-

1- आपात काल – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 में देश में आपातकाल लागू किए जाने के प्रावधान रखे गये हैं जो मूलतः जर्मनी के वाइमर संविधान एवं कुछ अंश 1935 के भारत सरकार अधिनियम से लिए गये है । इनके अनुसार आपातकाल की दशा में मौलिक अधिकारों को निलंबित किए जाने के प्रावधान है ।

हमारे देश में 3 बार राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई है किन्तु वर्ष 1975 में लगाया गया आपात काल सबसे लम्बे समय तक लागू किया गया आपात काल है क्योकि यह आपात काल बाहय सुरक्षा के स्थान पर आंतरिक सुरक्षा के आधार पर लागू किया गया था और तत्कालीन सरकार का दमनकारी फैसला था जिसमें देश के नागरिको के मौलिक अधिकारों के साथ साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन ली गई थी।

इसी समय पर इंदिरा सरकार के लोगों ने भारतीय संविधान का दूसरा कोई नाम नहीं होते हुए भी आपातकाल के समय भारतीय संविधान को इंदिरा का संविधान कहा गया था ।

तीनों आपात काल की तुलनात्मक विश्लेषण* इस प्रकार है.।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button