वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी होते हैं तीर्थंकर-मुनिश्री

गुना [जनकल्याण मेल] संसार में ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो यहां पर अनंतों बार जन्म और मरण करके नहीं आया हो। इस चार लाख चौरासी हजार योनियों में हमने कई बार जन्म और मरण किया है। परंतु धर्म एवां धर्म को धारण करने वालों की शरण नहीं ली। इसलिए हम चौरासी लाख योनियों के चक्कर लगा रहे हैं। यदि हम देव, शास्त्र और गुरु की शरण में आकर दो प्रतिमाओं के व्रत धारण कर लेते हैं तो अधिक से अधिक 8 भव में और कम से कम 2 भवों में हम इस संसार से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। उक्त धर्मोपदेश चौधरी मोहल्ला स्थित पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर पर चातुर्मासरत मुनिश्री निरोग सागरजी महाराज ने संसार भावना को समझाते हुए व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि हम जैसे कर्म करेंगे जैसे भाव करके प्रतिक्षण शुभ और अशुभ कर्मों का बंध करते चले जाते हैं। हमें सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र तीनों को अपनाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करना होगा। द्रव्य कर्म भाव कर्म और शरीर में होने वाले नो कर्मों से संसार बनता है। तपस्या, ध्यान के द्वारा इन बंधे हुए कर्मों को काटा जा सकता है। कर्म के रहित अवस्था का नाम मोक्ष कहलाता है। मुनिश्री ने बताया कि वीतराग विज्ञान के सामने चारे विज्ञान असफल हैं। जिनका राग वीतराग बन गया है ऐसे दिगंबर मुद्राधारी मुनिराजों को वीतरागी कहते हंै। मुनिश्री ने बताया कि जो तीर्थंकर होते हैं उमें तीन गुण होना आवश्यक है।पहला वीतरागी हो, दूसरा सर्वज्ञ हो, तीसरा हितोपदेशी हो। उक्त तीन गुण नहीं होने पर हमें उन्हें तीर्थंकर नहीं कह सकते। हमें अनंत भवों के पुण्ययोग से यह सुंदर मनुष्य पर्याय, शरीर, मन और उच्च कुल प्राप्त हुआ है। सोभागय से मुनिश्री योग सागरजी जैसे महान तपस्वी साधक मिले हैं। हमें उनके सानिध्य का लाभ सभी धार्मिक कक्षाओं में जाकर, आहारदान देकर करना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि यदि हमें पूर्व कर्म के कारण समझ में नहीं आता हेै तो भी स्वाध्याय में बैठना चाहिए। गु़रु और प्रभु की शरण में आकर हमारा पुण्य इतना बढ़ जाता है कि अंत में हमें केवलज्ञान और मोक्ष भी प्राप्त करा सकता है। इस मौके पर मंत्री अनिल जैन अंकल ने बताया गया कि मनेाज भैया जबलपुर के निर्देशन में त्रिदिवसीय रक्षाबंधन विधान 7 से 9 अगस्त तक पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर पर आयोजित होगा। सभी मंदिरों से धर्म रक्षा शिरोमणि परिवार आकर सौ-सौ श्रीफल अर्घ सहित समर्पित करेंगे।

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